अधूरी या तोड़ी-मरोड़ी जानकारी से बढ़ सकती हैं दूरियां: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Allahabad Highcourt

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बार और बेंच के बीच जारी तनाव के बीच युवा वकीलों से सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के बजाय अपनी पढ़ाई और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान देने को कहा है। अदालत ने यह भी चेताया कि हाईकोर्ट के कामकाज को लेकर अधूरी या तोड़ी-मरोड़ी जानकारी साझा करने से वकीलों और न्यायाधीशों के बीच मतभेद और गहरे हो सकते हैं।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने 30 अक्टूबर को एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। अदालत के सामने बताया गया कि कुछ वकीलों ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को अदालत में आने से रोका था। आदेश में एक महिला अधिवक्ता को भी अदालत में प्रवेश करने से रोके जाने की बात दर्ज की गई। अदालत ने कहा कि कुछ लोगों की वजह से न्यायिक कार्यवाही को बाधित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब अन्य वकील अपने मामलों की सुनवाई चाहते हों।

मामला क्या है?

हाईकोर्ट में बार और बेंच के बीच मौजूदा विवाद 27 अक्टूबर को न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत में हुई घटना के बाद बढ़ा। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत कक्ष में एक पुलिस अधिकारी के बैठने की जगह को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद एक वकील के साथ कथित व्यवहार को लेकर वकीलों ने विरोध जताया। अगले दिन अदालत की कार्यवाही में व्यवधान और कोर्टरूम में तोड़फोड़ की खबरें भी सामने आईं। इन घटनाओं के बाद अलग-अलग पक्षों ने अपनी-अपनी आपत्तियां और दावे रखे।

इस बीच न्यायमूर्ति देशवाल ने 28 और 29 अक्टूबर को अदालत की कार्यवाही बाधित किए जाने पर आपत्ति जताई थी। 30 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि अदालत की गरिमा बनाए रखना केवल न्यायाधीशों की नहीं, बल्कि वकीलों की भी जिम्मेदारी है।

सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी को लेकर अदालत की चिंता

अदालत ने सोशल मीडिया पर हाईकोर्ट के कामकाज और वकीलों से जुड़े कुछ पोस्ट का भी संज्ञान लिया। आदेश में कहा गया कि अधूरी या तोड़ी-मरोड़ी जानकारी बार और बेंच के बीच अनावश्यक मतभेद बढ़ा सकती है। अदालत ने युवा वकीलों को अपने पेशेवर विकास, अध्ययन और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान देने की सलाह दी।

इस टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने वकीलों को सोशल मीडिया पर बोलने से रोक दिया है। अदालत की चिंता उस स्थिति को लेकर थी, जब किसी घटना की अपूर्ण या भ्रामक प्रशस्ति तनाव बढ़ा सकती है और न्यायिक संस्थान पर जनता के भरोसे को प्रभावित कर सकती है।

बार और बेंच का रिश्ता क्यों अहम है?

‘बार’ से आशय वकीलों और उनकी पेशेवर संस्थाओं से है, जबकि ‘बेंच’ न्यायाधीशों और अदालत की पीठ को कहा जाता है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन न्यायिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए उनका सहयोग जरूरी है।

वकील पक्षकारों की ओर से अदालत में दलीलें रखते हैं और न्यायिक प्रक्रिया में सहायता करते हैं। न्यायाधीश कानून और प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर मामलों का निर्णय करते हैं। यदि अदालत की कार्यवाही बाधित होती है, तो इसका असर केवल वकीलों या न्यायाधीशों पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर भी पड़ता है जो अपने मुकदमों की सुनवाई के लिए अदालत पहुंचते हैं।

इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत की गरिमा बनाए रखना साझा जिम्मेदारी है। आदेश में यह भी दर्ज है कि अदालत और न्यायिक व्यवस्था पर जनता का भरोसा वकीलों के सामाजिक सम्मान से जुड़ा है।

अदालत ने बार एसोसिएशन से क्या अपेक्षा की?

न्यायमूर्ति देशवाल ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की नई निर्वाचित कार्यकर्ता से विवाद पर विचार करने और अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाने की अपेक्षा की। अदालत ने सरकारी वकीलों की भूमिका का भी उल्लेख किया और कहा कि वे भी बार का हिस्सा हैं, इसलिए उनके सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए।

अदालत ने संबंधित जमानत याचिका पर सुनवाई आगे बढ़ाने के बजाय उसे 26 नवंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। आदेश में कहा गया कि याचिकाकर्ता के वकील के अदालत में उपस्थित न हो पाने की वजह बताई गई थी कि कुछ लोगों ने उन्हें प्रवेश से रोका।

इस टिप्पणी का व्यापक मतलब

हाईकोर्ट की चिंता सिर्फ एक कोर्टरूम में हुए विवाद तक सीमित नहीं है। जब अदालतों में विरोध या किसी घटना को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं, तो अपुष्ट जानकारी तेजी से फैल सकती है। इससे संबंधित पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ने और सामान्य न्यायिक कामकाज प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

हालांकि, किसी घटना पर सवाल उठाना, अपनी बात रखना या संस्थागत जवाबदेही की मांग करना और जानबूझकर अधूरी या भ्रामक जानकारी फैलाना अलग-अलग बातें हैं। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि विवाद के बीच तथ्यात्मक जानकारी, संयम और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान बना रहना चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बार-बेंच टकराव के बीच युवा वकीलों को अपने पेशेवर विकास पर ध्यान देने और सोशल मीडिया पर अधूरी या तोड़ी-मरोड़ी जानकारी से दूर रहने की सलाह दी है। अदालत का संदेश यह है कि विरोध या मतभेद के बावजूद न्यायिक कार्यवाही बाधित नहीं होनी चाहिए और अदालत की गरिमा बनाए रखना वकीलों तथा न्यायाधीशों, दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

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