इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 2021 के चर्चित धर्मांतरण मामले में 16 दोषियों की याचिकाओं पर सुनाया फैसला; जमानत पकाने वालों को जुर्माने की 50% राशि जमा करने समेत कई शर्तों का पालन करना होगा।

उत्तर प्रदेश के चर्चित अवैध धर्मांतरण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में दोषी ठहराए गए 16 लोगों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आठ को राहत दे दी, जबकि कथित मुख्य आरोपियों मोहम्मद उमर गौतम और मौलाना कलीम सिद्दीकी समेत आठ दोषियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। यह मामला उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण निषेध कानून लागू होने के बाद दर्ज हुए शुरुआती बड़े मामलों में शामिल है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने बुधवार को 16 आपराधिक अपीलों से जुड़ी जमानत याचिकाओं पर साझा आदेश पारित किया। ये अपीलें लखनऊ की विशेष एनआईए अदालत के 11 सितंबर 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थीं। हाईकोर्ट ने जमानत के सवाल पर दोनों समूहों के मामलों में आरोपों की प्रकृति, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और उनके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग आधार पर देखा।
इन आठ दोषियों को मिली जमानत
हाईकोर्ट से जिन आठ दोषियों को अपील लंबित रहने के दौरान जमानत मिली है, उनमें मन्नू यादव, अब्दुल्ला उमर, धीरज गोविंदराव जगताप, भूप्रिया बांदो उर्फ अरसलान मुस्तफा, सरफराज अली जाफरी, मोहम्मद सलीम, कुनाल अशोक चौधरी उर्फ आतिफ और राहुल भोला शामिल हैं।
अदालत ने इन दोषियों को राहत देते हुए उनके मामले में आरोपों की प्रकृति और कथित भूमिका पर विचार किया। पीठ के अनुसार, इन आठ लोगों के खिलाफ आरोप और साक्ष्यों की स्थिति उन अन्य दोषियों की तुलना में अपेक्षाकृत हल्की थी, जिन्हें जमानत देने से इनकार किया गया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि कुछ दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 121A के तहत दोषी नहीं ठहराया गया था। यह धारा भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश से संबंधित है।
उमर गौतम और कलीम सिद्दीकी समेत आठ की याचिकाएं खारिज
हाईकोर्ट ने मोहम्मद उमर गौतम, मौलाना कलीम सिद्दीकी, मुफ्ती काजी झांगीर कासमी, सलाहुद्दीन जैनुद्दीन शेख, प्रसाद रामेश्वर कावरे उर्फ आदम, इरफान शेख, कौसर आलम और डॉ. फराज बाबुल्लाह शाह को जमानत देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने इन दोषियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों को गंभीर प्रकृति का माना। पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूदगी सामग्री और संबंधित लोगों की भूमिका को देखते हुए अपील के निस्तारण तक उन्हें जमानत पर रिहा करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता। इस तरह अदालत ने एक ही मामले में शामिल सभी 16 दोषियों को समान राहत देने के बजाय प्रत्येक समूह के खिलाफ आरोपों और साक्ष्यों के अंतर को ध्यान में रखा।
जमानत के साथ लगाई गईं कई शर्तें
जिन आठ दोषियों को जमानत दी गई है, उन्हें अदालत की ओर से तय शर्तों का पालन करना होगा। प्रत्येक दोषी को व्यक्तिगत मुचलका और दो जमानतदार प्रस्तुत करने होंगे। यदि उनका पासपोर्ट जारी हुआ है और पहले से जमा नहीं है, तो उसे संबंधित निचली अदालत में जमा करना होगा।
इसके अलावा, सभी को अपनी आपराधिक अपीलों की सुनवाई में सहयोग करना होगा और बिना पर्याप्त कारण के सुनवाई टालने की मांग नहीं करनी होगी। हाईकोर्ट की अनुमति के बिना वे देश छोड़कर नहीं जा सकेंगे। अदालत ने यह शर्त भी रखी है कि जमानत पर रहने के दौरान वे इस तरह की किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।
जमानत पकाने वाले आठ दोषियों को निचली अदालत की ओर से लगाए गए कुल जुर्माने की 50 प्रतिशत राशि रिहाई के दो महीने के भीतर जमा करनी होगी। शेष 50 प्रतिशत जुर्माने पर फिलहाल रोक रहेगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय में आधा जुर्माना जमा नहीं करने पर जमानत स्वतः रद्द हो जाएगी और संबंधित दोषियों को दोबारा जेल भेजा जा सकता है। शर्तों का उल्लंघन होने पर अभियोजन पक्ष जमानत निरस्त कराने के लिए अदालत का रुख भी कर सकेगा।
2021 में ATS ने खोला था मामला
इस मामले की शुरुआत 20 जून 2021 को हुई थी, जब उत्तर प्रदेश एटीएस ने कथित अवैध धर्मांतरण नेटवर्क के संबंध में कार्रवाई की थी। जांच एजेंसी ने दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में संचालित इस्लामिक दावा सेंटर के अध्यक्ष मोहम्मद उमर गौतम और संस्था से जुड़े मुफ्ती काजी जहांगीर कासमी को गिरफ्तार किया था। इसके बाद उमर गौतम के बेटे अब्दुल्ला उमर समेत अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया।
जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि कमजोर आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले लोगों, महिलाओं, बच्चों तथा दिव्यांग व्यक्तियों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया गया। अभियोजन पक्ष ने इस कथित नेटवर्क में विदेशी फंडिंग और संगठित गतिविधियों की बात भी कही थी। उमर गौतम पर करीब एक हजार लोगों के धर्मांतरण से जुड़े आरोप लगाए गए थे। ये सभी अभियोजन पक्ष के आरोप हैं, जिन पर अपील की सुनवाई में न्यायिक विचार होना बाकी है।
मामले में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की विभिन्न धाराओं के साथ भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के प्रावधानों के तहत मुकदमा चला गया था।
2024 में विशेष अदालत ने सुनाई थी सजा
लखनऊ की विशेष एनआईए अदालत ने 11 सितंबर 2024 को इस मामले से जुड़े चार सत्र परीक्षणों में फैसला सुनाते हुए आरोपियों को दोषी ठहराया था। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपीलें दाखिल कीं। इन्हीं अपीलों के लंबित रहने के दौरान सजा के बाद जमानत की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने अब जमानत याचिकाओं पर फैसला कर दिया है, लेकिन इससे दोषसिद्धि समाप्त नहीं हुई है। जिन आठ लोगों को जमानत मिली है, उनकी अपीलों पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। अदालत ने मामले के ट्रायल कोर्ट रिकॉर्ड तलब करने और अपीलों की सुनवाई के लिए आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। इन आपराधिक अपीलों को जनवरी 2027 के पहले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने को कहा गया है।
इस फैसले से मामले में शामिल 16 दोषियों की कानूनी स्थिति में अंतर जरूर आया है, लेकिन पूरे प्रकरण का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी आना बाकी है। एक ओर आठ दोषियों को अपील लंबित रहने तक जेल से बाहर रहने की अनुमति मिली है, वहीं दूसरी ओर उमर गौतम और मौलाना कलीम सिद्दीकी समेत आठ लोगों को फिलहाल जेल में ही रहना होगा। अब सबकी नजर जनवरी 2027 में प्रभावित अपीलों की सुनवाई पर रहेगी।
Also Read: पहले वनडे में भारत की गेंदबाजी का दम, न्यूजीलैंड 185 रन पर सिमटा

