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इलाहाबाद हाईकोर्ट: 2011 की जनगणना के आधार पर ही तय होगी ग्राम पंचायत

वर्तमान आबाद नहीं, अंतिम प्रकाशित जनगणना के आंकड़े होंगे आधार; गोंडा की ग्राम पंचायत के विलय को सही ठहराया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ

लखनऊ | विधिक संवाददाता, शुभांकर भानू

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के तहत किसी ग्राम पंचायत के गठन और उसके अस्तित्व का निर्धारण वर्तमान आबादी के आधार पर नहीं, बल्कि अंतिम प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जाएगा। न्यायालय ने कहा कि यदि वर्तमान आबादी को आधार बनाया जाए तो पंचायतों की सीमाओं और गठन में बार-बार बदलाव करना पड़ेगा, जिससे प्रशासनिक अस्थिरता पैदा होगी।

यह फैसला न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने गुड़िया गोस्वामी समेत 293 अन्य लोगों की याचिका खारिज करते हुए सुनाया।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ताओं ने 19 अप्रैल 2023 की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसके तहत गोंडा जिले की करुआ ग्राम पंचायत को समाप्त कर उसके शेष क्षेत्र का कुम्हौरा ग्राम पंचायत में विलय कर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नगर पालिका परिषद कर्नलगंज में कुछ क्षेत्र शामिल होने के बाद भी करुआ ग्राम पंचायत की आबादी 1,719 और मतदाताओं की संख्या 1,104 थी। इसलिए पंचायत को समाप्त करने का फैसला गलत है।

राज्य सरकार ने क्या कहा?

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्ष 2011 की अंतिम प्रकाशित जनगणना के अनुसार करुआ ग्राम पंचायत की शेष आबादी केवल 785 थी। जबकि पंचायत के गठन और अस्तित्व के लिए कानून के अनुसार न्यूनतम 1,000 आबादी होना आवश्यक है। इसी आधार पर पंचायत का विलय किया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने कहा कि पंचायत राज अधिनियम में प्रयुक्त ‘जनसंख्या’ का अर्थ अंतिम प्रकाशित जनगणना में दर्ज आबादी से है। वर्तमान आबादी या मतदाताओं की संख्या के आधार पर ग्राम पंचायत का दर्जा बनाए रखने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि हर बार वर्तमान आबादी को आधार बनाया जाएगा तो पंचायतों के गठन और सीमाओं में लगातार बदलाव करना पड़ेगा, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होगी।

सरकार का अधिकार, सीमित होगा न्यायिक हस्तक्षेप

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ग्राम पंचायत क्षेत्र का गठन, पुनर्गठन या सीमाओं का निर्धारण राज्य सरकार का विधायी कार्य है। ऐसे मामलों में न्यायालय तभी हस्तक्षेप करेगा, जब संबंधित कार्रवाई कानून के किसी प्रावधान का स्पष्ट उल्लंघन करती हो।

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