2003 में चाकू और बंदूक से हुए हमले के मामले में हाईकोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल; दोनों को दो सप्ताह में सरेंडर करने का निर्देश

लखनऊ/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बहराइच में करीब 23 साल पुराने हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए दो दोषियों को बड़ी राहत देने पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने दोनों की प्रोबेशन पर रिहाई का आदेश रद्द कर उन्हें दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत के मुताबिक, अपराध की गंभीरता और दोषियों के आचरण पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना उन्हें जेल की सजा से राहत देना उचित नहीं था।
जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अपराध की प्रकृति और दोषी के चरित्र को अच्छे आचरण के आधार पर रिहाई देने के फैसले में प्रमुखता मिलनी चाहिए। अदालत ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को गलत सहानुभूति का उदाहरण बताया।
दुकान के विवाद से शुरू हुआ था मामला
यह मामला वर्ष 2003 का है। शिकायत के मुताबिक, बहराइच में दुकान खोलने को लेकर कारोबारी रंजिश पैदा हुई थी। आरोप था कि एक व्यक्ति ने धारदार हथियार और दूसरे ने बंदूक से पीड़ित पर हमला किया। हमले में उसे गंभीर चोटें आईं और वह बेहोश हो गया। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया।
मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल के कठोर कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 के तहत उन्हें अच्छे आचरण की शर्त पर रिहा करने का लाभ दे दिया।
22 साल बीतने को राहत का आधार बनाने पर आपत्ति
हाईकोर्ट ने घटना के बाद बीते लंबे समय और पूर्व दोषसिद्धि न होने जैसे पहलुओं को राहत देने के आधारों में शामिल किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि दोनों आरोपी जमानत पर बाहर थे और उन्होंने जेल में एक दिन भी नहीं बिताया था। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि हमले के बाद पीड़ित को लंबे समय तक उसके गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट, दोनों के मामले से निपटने के तरीके की आलोचना की। पीठ ने चोटों की गंभीरता और अपराध की प्रकृति को देखते हुए कहा कि इन पहलुओं को दोषियों को राहत देने के फैसले में उचित महत्व मिलना चाहिए था।
धारा 307 और 308 पर भी उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल के दौरान भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के बजाय धारा 308 के तहत आरोप तय किए जाने पर भी सवाल उठाया। अदालत के अनुसार, मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज कटने और गोली लगने की चोटों की गंभीरता को देखते हुए मामला हत्या के प्रयास से संबंधित धारा 307 के तहत बनता था। हालांकि, ट्रायल धारा 308 के तहत चला था और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस पहलू पर भी टिप्पणी की।
दो सप्ताह में सरेंडर करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के प्रोबेशन संबंधी आदेश को निरस्त करते हुए दोनों दोषियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। ऐसा नहीं करने पर बहराइच के अतिरिक्त सत्र न्यायालय को उन्हें हिरासत में लेने के लिए तत्काल कार्रवाई शुरू करने को कहा गया है।
अदालत ने आपराधिक अपीलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में फिर से बहाल करने का निर्देश भी दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि दोनों को हिरासत में लिए जाने के बाद ही अपील पर सुनवाई की जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में मुख्य संदेश यह है कि केवल लंबे समय तक मुकदमा चलने या पूर्व दोषसिद्धि न होने के आधार पर प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। अपराध की गंभीरता, पीड़ित को हुई क्षति और दोषियों के आचरण पर भी विचार करना जरूरी है।
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