पूर्व कलेक्टर की रिपोर्ट में 600 मामले, मौजूदा रिपोर्ट में 449; हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में अंतर की वजह पूछी

श्योपुर: मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीन से जुड़े मामलों को लेकर हाईकोर्ट ने प्रशासन से जवाब मांगा है। अदालत के सामने पूर्व और मौजूदा कलेक्टर की रिपोर्ट में मामलों की संख्या अलग-अलग सामने आने के बाद रिकॉर्ड की स्थिति पर सवाल उठे हैं। पूर्व कलेक्टर की ओर से 600 मामले बताए गए थे, जबकि बाद में पेश रिपोर्ट में 449 मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई। दोनों आंकड़ों के बीच 151 मामलों का अंतर है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि जब पहले आधिकारिक स्तर पर 600 प्रकरण लंबित बताए गए थे, तो बाद की रिपोर्ट में इनकी संख्या घटकर 449 कैसे रह गई। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि बाकी 151 मामलों की वर्तमान स्थिति क्या है और क्या उनका रिकॉर्ड किसी स्तर पर अपडेट या स्थानांतरित किया गया।
राजस्व रिकॉर्ड को लेकर भी उठे सवाल
यह विवाद केवल लंबित मामलों की संख्या तक सीमित नहीं है। याचिका में आदिवासियों और अनुसूचित जाति से जुड़े भूमि रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने के आरोप भी उठाए गए हैं। पूर्व कलेक्टर की ओर से फरवरी 2024 में भेजी गई रिपोर्ट में राजस्व अधिकारियों के स्तर पर सामने आई कथित अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया था।
अदालत ने यह संभावना भी उठाई कि कहीं कुछ प्रकरणों को राजस्व रिकॉर्ड या संबंधित पोर्टल पर दर्ज करने में लापरवाही तो नहीं हुई। कोर्ट ने इस पहलू को स्पष्ट करने की जरूरत बताई है। हालांकि, 151 मामलों को जानबूझकर रिकॉर्ड से हटाने या दबाने की बात अभी साबित नहीं हुई है और यह अदालत के सवालों एवं जांच का विषय है।
दो रिपोर्टों के बीच अंतर बना मुख्य मुद्दा
तत्कालीन कलेक्टर संजय कुमार ने 7 फरवरी 2024 को राज्य सरकार को भेजे पत्र में जमीन से जुड़े करीब 600 मामलों की जानकारी दी थी। मौजूदा कलेक्टर शीला दाहिमा की ओर से अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट में 449 मामलों का उल्लेख किया गया। अब हाईकोर्ट इस अंतर का आधार और दोनों रिपोर्टों के बीच सामंजस्य की स्थिति जानना चाहता है।
अदालत ने यह भी सवाल किया कि वर्तमान प्रशासन ने पूर्व कलेक्टर से संपर्क कर यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की कि 600 मामलों का आंकड़ा किन रिकॉर्ड और जांच के आधार पर तैयार किया गया था।
अगली सुनवाई में सरकार को देना होगा जवाब
अब राज्य सरकार को दोनों रिपोर्टों के बीच मौजूद अंतर को स्पष्ट करना होगा। खास तौर पर उन 151 मामलों की स्थिति सामने रखना महत्वपूर्ण होगा, जिनका उल्लेख एक रिपोर्ट में है लेकिन दूसरी में नहीं।
मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है। तब सरकार को रिकॉर्ड से जुड़े सवालों पर अपना जवाब देना होगा। इस मामले में अदालत की नजर सिर्फ मामलों की संख्या पर नहीं, बल्कि आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी है।
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