अरुण प्रताप सिंह हत्या और अपहरण के मामले में बरी हुए; अदालत ने जांच को लापरवाही भरा बताते हुए DGP और गृह सचिव को आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए। जेल से निकलने के बाद सड़क हादसे में भी घायल हुए अरुण।

नई दिल्ली/आगरा। उत्तर प्रदेश के आगरा में हत्या और अपहरण के एक मामले की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने अरुण प्रताप सिंह को छह लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अरुण को इस मामले में करीब छह साल तक जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में रहना पड़ा था, लेकिन सुनवाई के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जांच को लापरवाहीपूर्ण और अभियोजन की कार्रवाई को अव्यवस्था करार दिया। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को सही तरीके से जांच करने की प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करना चाहिए। आदेश की प्रति प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को भेजने का निर्देश भी दिया गया है।
2019 में दर्ज हुआ था अपहरण और हत्या का मामला
यह मामला आगरा जिले में वर्ष 2019 में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। पुलिस ने अरुण को अपहरण, हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोपों में गिरफ्तार किया था। वह 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद थे।
अरुण का नाम न तो शुरुआती प्राथमिकी में था और न ही शिकायतकर्ता के शुरुआती बयान में। बाद में उन्हें सीसीटीवी फुटेज और सह-आरोपी के कथित बयान के आधार पर मामले से जोड़ा गया। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से जेल में बंद अरुण की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत को तीन महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद मुकदमे की सुनवाई पूरी हुई और जून 2026 में आगरा की अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप साबित नहीं कर पाने के कारण अरुण को बरी कर दिया।
सीसीटीवी और दूसरे साक्ष्यों पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले और मामले के साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान जांच में कई कमियां पाईं। अदालत के सामने आया कि सीसीटीवी फुटेज स्पष्ट नहीं था और उसे कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप प्रमाणित नहीं किया गया था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड के लिए भी जरूरी प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बरामद जली हुई हड्डियों की पहचान निर्णायक रूप से नहीं हो सकी। मृतक बताए गए व्यक्ति के पिता के डीएनए नमूने से हड्डियों का मिलान कराने की प्रक्रिया भी नहीं अपनी गई। कथित फिरौती की मांग और आरोपी को अपराध से जोड़ने वाले दूसरे महत्वपूर्ण तथ्यों की पुष्टि में भी कमियां रहीं।
पीठ ने कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। अदालत के अनुसार, जांच और अभियोजन का उद्देश्य केवल किसी तरह सजा दिलाना नहीं, बल्कि पीड़ित और आरोपी—दोनों के साथ न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।
एक महीने में मुआवजा देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अरुण प्रताप सिंह को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। तय समय में भुगतान नहीं होने पर मुआवजे की राशि पर 18 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
अदालत ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति की जिंदगी के छह साल केवल अनुमानों और मनगढ़ंत कहानी के आधार पर छीन लिए जाना गंभीर अन्याय है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
जेल से बाहर आने के बाद सड़क हादसे में घायल
इस मामले में अरुण की मुश्किलें जेल से रिहा होने के बाद भी खत्म नहीं हुईं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रिहाई के बाद उन्होंने दोपहिया वाहन के शोरूम में बिक्री से जुड़ी नौकरी शुरू की थी। 10 अक्टूबर 2026 को एक कार की टक्कर से वह घायल हो गए। हादसे में उनकी कई पसलियां टूट गईं और उनकी हालत ऐसी बताई गई कि वह बिस्तर पर रहने को मजबूर हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, मुकदमे के खर्च के लिए उनके परिवार को जमीन बेचनी पड़ी और घर गिरवी रखना पड़ा था। जेल में बिताया वर्षों और उसके बाद हुए हादसे ने उनके जीवन को और कठिन बना दिया है।
पुलिस जांच की जवाबदेही पर अहम सवाल
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आपराधिक जांच में साक्ष्यों की विश्वसनीयता, कानूनी प्रक्रियाओं के पालन और पुलिस की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। किसी आरोपी को दोषी साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की होती है और जांच में गंभीर कमियां किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लंबे समय तक असर डाल सकती हैं।
अदालत ने पुलिस अधिकारियों को जांच की प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करने की जरूरत पर जोर दिया है। अब राज्य सरकार को निर्धारित समय में मुआवजे का भुगतान करना होगा।
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