यूपी बार काउंसिल का बड़ा एक्शन, लखनऊ सेंट्रल बार के अध्यक्ष-महामंत्री का पंजीकरण निलंबित

अखिलेश जायसवाल और अवनीश दीक्षित को कारण बताओ नोटिस; बार काउंसिल के प्रस्ताव को सदन में खारिज करने का आरोप, अनुशासन समिति करेगी सुनवाई

लखनऊ: सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित के खिलाफ उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। बार काउंसिल ने दोनों का अधिवक्ता पंजीकरण तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। साथ ही दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत उनका पंजीकरण स्थायी रूप से निरस्त क्यों न किया जाए।

यह कार्रवाई बार काउंसिल की मंगलवार को हुई वर्चुअल आपात बैठक में बहुमत से लिए गए फैसले के बाद हुई। मामला सेंट्रल बार एसोसिएशन के आगामी चुनाव की प्रक्रिया और उसकी निगरानी को लेकर सामने आए विवाद से जुड़ा है।

क्या है पूरा विवाद?

रिपोर्टों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्देशों के अनुपालन में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने 23 अगस्त 2026 को सेंट्रल बार एसोसिएशन के चुनाव को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके तहत एल्डर्स कमेटी को चुनाव कराने की जिम्मेदारी देने और चुनाव प्रक्रिया की निगरानी के लिए बार काउंसिल के पांच सदस्यों को पर्यवेक्षक नियुक्त करने का निर्णय लिया गया था।

इन पर्यवेक्षकों में श्रीनाथ त्रिपाठी, इमरान माबूद खान, मधुसूदन त्रिपाठी, देवेंद्र मिश्र नगरहा और श्रीश कुमार मेहरोत्रा के नाम शामिल हैं।

बार काउंसिल का आरोप है कि सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री ने इस अधिकृत प्रस्ताव को अपनी संस्था के सदन में रखकर खारिज कर दिया। काउंसिल ने इस कदम को उसके विधिसम्मत निर्णय की अवहेलना और बार काउंसिल की गरिमा को प्रभावित करने वाला कृत्य माना। इसी आधार पर इसे अधिवक्ता अधिनियम की धारा 35 के तहत पेशेवर कदाचार के दायरे में रखते हुए कार्रवाई की गई।

पांच सदस्य किए गए थे चुनाव पर्यवेक्षक

बार काउंसिल के अनुसार, चुनाव प्रक्रिया को लेकर निगरानी व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि चुनाव निर्धारित प्रक्रिया के तहत संपन्न हो सके। इसी के तहत पांच सदस्यों को पर्यवेक्षक की भूमिका दी गई थी।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सेंट्रल बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों द्वारा बार काउंसिल के प्रस्ताव को सदन में अस्वीकार किए जाने को ही मौजूदा अनुशासनात्मक कार्रवाई का मुख्य आधार बनाया गया है।

क्या अब हमेशा के लिए लाइसेंस रद्द होगा?

अभी ऐसा नहीं हुआ है। फिलहाल दोनों अधिवक्ताओं का पंजीकरण निलंबित किया गया है और उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया गया है। नोटिस में पूछा गया है कि उनका पंजीकरण स्थायी रूप से निरस्त क्यों न किया जाए।

मामले को उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति को सौंप दिया गया है। समिति की अध्यक्षता बार काउंसिल के अध्यक्ष शिवकिशोर गौड़ करेंगे, जबकि प्रतिनिधि सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी भी समिति में शामिल हैं। समिति संबंधित पक्षों को सुनने के बाद आगे का आदेश पारित करेगी।

निलंबन के फैसले पर अलग राय भी सामने आई

बैठक में सभी सदस्य तत्काल निलंबन के पक्ष में थे, ऐसा नहीं है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक बार काउंसिल के सदस्य अखिलेश कुमार अवस्थी और परेश मिश्र ने तत्काल निलंबन के बजाय पहले दोनों पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का मत रखा था। हालांकि बैठक में बहुमत से पंजीकरण निलंबित करने का निर्णय लिया गया।

सेंट्रल बार एसोसिएशन की अपनी वेबसाइट पर अखिलेश जायसवाल को अध्यक्ष और अवनीश दीक्षित को महामंत्री के रूप में दर्ज किया गया है।

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