यूपी की महिला बेसिक शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का अवमानना संबंधी आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि तबादले में विद्यार्थियों की पढ़ाई और स्कूल में शिक्षकों की उपलब्धता को प्राथमिकता देनी होगी।

नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परिषद के शिक्षकों के अंतरजनपदीय तबादले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिवार से दूर रहने की परेशानी के आधार पर कोई सरकारी कर्मचारी दूसरे जिले में तबादले को अपना कानूनी अधिकार नहीं मान सकता। तबादले पर निर्णय लेते समय विभागीय नियमों, स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उत्तर प्रदेश की एक महिला प्राथमिक शिक्षिका के मामले में यह टिप्पणी की। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें शिक्षिका का तबादला आवेदन खारिज किए जाने के मामले में अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का प्रथम दृष्टया आधार माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अपील स्वीकार करते हुए अवमानना की कार्यवाही समाप्त कर दी।
बहराइच से लखनऊ तबादला चाहती थीं शिक्षिका
मामला बहराइच में तैनात एक महिला बेसिक शिक्षिका से जुड़ा है। शिक्षिका ने अपने पति और ससुराल पक्ष के लखनऊ में रहने का हवाला देते हुए अंतरजनपदीय तबादले की मांग की थी। उन्होंने बताया था कि वह अपनी करीब ढाई साल की बेटी के साथ बहराइच में अकेले रह रही हैं, जबकि उनके पति और ससुराल के अन्य सदस्य लखनऊ में रहते हैं।
शिक्षिका ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) (तैनाती) नियमावली, 2008 के नियम 8(2)(घ) के तहत अपने आवेदन पर विचार करने की मांग की थी। इस प्रावधान के तहत विशेष परिस्थितियों में महिला शिक्षकों के अंतरजनपदीय तबादले के आवेदन पर विचार किया जा सकता है।
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2023 को अधिकारियों को शिक्षिका के दावे पर संबंधित नियम के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया था। बाद में आवेदन खारिज किए जाने के बाद अवमानना याचिका दायर हुई। इसी मामले में हाईकोर्ट के आदेश को बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
तबादला आवेदन खारिज करने के पीछे क्या था आधार?
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित आदेश का परीक्षण करते हुए पाया कि शिक्षिका को तबादले के लिए निर्धारित प्रक्रिया में 12 अंक मिले थे, जबकि बहराइच जिले से बाहर तबादले के लिए न्यूनतम कटऑफ 22 अंक था।
अदालत ने स्कूल में शिक्षकों की कमी को भी महत्वपूर्ण माना। संबंधित विद्यालय में 137 विद्यार्थी पढ़ रहे थे, लेकिन प्राथमिक कक्षाओं के लिए केवल दो शिक्षक तैनात थे, जबकि लागू मानकों के अनुसार पांच शिक्षकों की आवश्यकता थी। ऐसे में एक शिक्षक के भी स्थानांतरित होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका थी।
पीठ ने माना कि अधिकारियों ने आवेदन खारिज करते समय पात्रता और स्कूल की जरूरतों से जुड़े कारण दिए थे। इसलिए उनके आदेश को हाईकोर्ट के पूर्व निर्देश की अवहेलना मानने का आधार नहीं बनता।
महिला शिक्षकों के लिए विशेष छूट का क्या अर्थ?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 8(2)(घ) महिला कर्मचारियों को कुछ विशेष परिस्थितियों में राहत देने का प्रावधान है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर आवेदन पर तबादला अनिवार्य रूप से मंजूर किया जाए।
अदालत के अनुसार, अंतरजनपदीय तबादले में कैडर बदलने का पहलू भी शामिल हो सकता है। इसलिए केवल परिवार से अलग रहने के आधार पर तबादले का दावा अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता। आवेदन पर विचार करते समय लागू नियमों और प्रशासनिक जरूरतों को भी महत्व देना होगा।
विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्राथमिकता
पीठ ने अपने फैसले में शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य पर जोर देते हुए कहा कि स्कूल व्यवस्था का मुख्य केंद्र विद्यार्थी हैं, न कि शिक्षकों की सुविधाजनक तैनाती या करियर संबंधी जरूरतें। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि महिला शिक्षकों को दी गई विशेष छूट का इस्तेमाल इस तरह नहीं होना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में अंतरजनपदीय तबादले के आवेदन पर विचार करते समय पारिवारिक परिस्थितियों के साथ पात्रता, विभागीय नियमों और संबंधित विद्यालय में शिक्षकों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में तबादला नहीं हो सकता; अदालत ने संबंधित मामले में तबादले को स्वतः मिलने वाला अधिकार मानने से इनकार किया है।
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