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El Niño क्या है? प्रशांत महासागर की गर्मी भारत का मौसम कैसे बदलती है

दुनिया के एक हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से हजारों किलोमीटर दूर बारिश, हवाओं और मानसून का पैटर्न क्यों बदल सकता है?

Al Nino

समुद्र की सतह के तापमान में कुछ डिग्री का बदलाव दुनिया के दूसरे छोर पर मौसम की दिशा बदल सकता है। El Niño इसी तरह की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसकी शुरुआत भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसके असर वायुमंडलीय परिसंचरण के जरिए दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।

भारत के लिए El Niño का नाम खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध दक्षिण-पश्चिम मानसून में बदलाव से जोड़ा जाता है। लेकिन यहां एक आम गलतफहमी दूर करना जरूरी है—El Niño कोई ऐसा स्विच नहीं है जिसे चालू करते ही भारत में सूखा पड़ जाए। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि El Niño और भारतीय मानसून के बीच संबंध मजबूत जरूर है, लेकिन हर El Niño का भारत पर असर एक जैसा नहीं होता।

सबसे पहले समझिए, El Niño है क्या?

सरल भाषा में कहें तो El Niño भूमध्यरेखीय मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह के पानी के सामान्य से अधिक गर्म होने की घटना है। यह केवल समुद्र के तापमान का मामला नहीं है; समुद्र और वातावरण के बीच होने वाला बदलाव इसका अहम हिस्सा है। इसी वजह से वैज्ञानिक इसे ENSO यानी El Niño-Southern Oscillation नामक समुद्र-वायुमंडल प्रणाली के गर्म चरण के रूप में देखते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखा के आसपास प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली ट्रेड विंड्स गर्म सतही पानी को एशिया और इंडोनेशिया की ओर धकेलती हैं। इसके उलट दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। इसे अपवेलिंग कहा जाता है।

इस व्यवस्था में प्रशांत महासागर के पश्चिमी हिस्से में गर्म पानी जमा रहता है, जबकि पूर्वी हिस्से में अपेक्षाकृत ठंडा पानी बना रहता है। गर्म पानी के ऊपर हवा गर्म और नम होकर ऊपर उठती है, जिससे बादल और बारिश बनती है।

फिर El Niño में क्या बदल जाता है?

El Niño के दौरान इस सामान्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव आता है। भूमध्यरेखीय प्रशांत की ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ने लगती हैं। इसके साथ पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है।

नतीजा यह होता है कि मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत की समुद्री सतह सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाती है। साथ ही दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र की गहराई से ऊपर आने वाला ठंडा पानी भी कमजोर पड़ जाता है।

यही वह बिंदु है जहां El Niño केवल समुद्र की घटना नहीं रहता। समुद्र की सतह पर बदली गर्मी वातावरण के ऊपर की हवा, बादलों, दबाव और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित करती है।

समुद्र की गर्मी हजारों किलोमीटर दूर मौसम कैसे बदलती है?

इसे समझने के लिए एक सरल उदाहरण लिया जा सकता है।

जहां समुद्र गर्म होता है, वहां से ज्यादा पानी वाष्पित होता है। नम हवा ऊपर उठती है और बादल बनने लगते हैं। El Niño के दौरान प्रशांत महासागर में वह क्षेत्र बदल जाता है जहां सबसे ज्यादा गर्मी और बादल बनने की प्रक्रिया होती है।

इससे वायुमंडलीय परिसंचरण, खासकर भूमध्यरेखीय प्रशांत की Walker Circulation, में बदलाव आता है। यह बदलाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। वातावरण में पैदा हुई ऊर्जा और दबाव का पुनर्विन्यास दूर-दूर तक मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिक इसी दूरस्थ प्रभाव को व्यापक रूप से टेली-कनेक्शन (teleconnection) के रूप में समझते हैं।

यानी बात यह नहीं है कि प्रशांत महासागर का गर्म पानी भारत तक पहुंच जाता है। असल में बदलता है वायुमंडल का व्यवहार। प्रशांत में समुद्र की गर्मी हवाओं और बादलों की व्यवस्था बदलती है और वही बदलाव दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम को प्रभावित कर सकता है।

भारत तक इसका असर कैसे पहुंचता है?

यहीं से El Niño और भारत का रिश्ता शुरू होता है।

भारतीय गर्मियों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की पूरी व्यवस्था समुद्र और जमीन के बीच तापमान व दबाव के अंतर, हवाओं, नमी और बड़े पैमाने के वायुमंडलीय परिसंचरण से जुड़ी होती है।

El Niño के दौरान प्रशांत महासागर में गर्म पानी और उससे जुड़ी संवहनीय गतिविधि (convection) का क्षेत्र पूर्व की ओर खिसकता है। इसके साथ Walker Circulation में बदलाव आता है। यह बदलाव ऐसे वायुमंडलीय हालात बना सकता है जो भारतीय उपमहाद्वीप पर मानसूनी गतिविधि को कमजोर करने की दिशा में काम करें।

इसी वजह से ऐतिहासिक आंकड़ों में El Niño वर्षों के दौरान भारत में कमजोर मानसून और सूखे की संभावना सामान्य वर्षों की तुलना में अधिक देखी गई है।

लेकिन यही कहानी का पूरा हिस्सा नहीं है।

क्या हर El Niño भारत में सूखा लाता है?

नहीं। यह इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है।

भारतीय और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययनों ने दिखाया है कि गंभीर भारतीय सूखे और El Niño के बीच मजबूत संबंध जरूर रहा है, लेकिन हर El Niño वर्ष में भारत का मानसून कमजोर नहीं हुआ। 1880 से 2005 के आंकड़ों का अध्ययन करने वाले एक शोध में पाया गया कि भारतीय गर्मियों की बारिश El Niño वर्षों में केवल लगभग 43 प्रतिशत मामलों में सामान्य से कम रही; बाकी वर्षों में बारिश सामान्य या सामान्य से अधिक भी रही।

एक अन्य अध्ययन ने भी निष्कर्ष निकाला कि El Niño के दौरान सूखे की संभावना बढ़ती है, लेकिन दोनों के बीच one-to-one relationship नहीं है। उदाहरण के लिए, 1997-98 का El Niño बेहद मजबूत था, फिर भी भारत में मानसूनी बारिश सामान्य से ऊपर रही थी।

इसका मतलब साफ है—El Niño जोखिम बढ़ाता है, परिणाम तय नहीं करता।

फिर एक El Niño दूसरे से अलग क्यों होता है?

क्योंकि हर El Niño एक जैसा नहीं होता।

प्रशांत महासागर में गर्मी कहां केंद्रित है, घटना कितनी मजबूत है, कब शुरू होती है, कितने समय तक रहती है और उसके दौरान वातावरण कैसे प्रतिक्रिया करता है, इन सभी बातों से उसका असर बदल सकता है।

वैज्ञानिक शोध में यह भी सामने आया है कि मध्य प्रशांत में केंद्रित गर्मी और पूर्वी प्रशांत में केंद्रित गर्मी का भारतीय मानसून पर असर समान नहीं हो सकता। कुछ प्रकार के El Niño भारत में बारिश कम होने के लिए अधिक अनुकूल वायुमंडलीय परिस्थितियां बना सकते हैं।

यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक सिर्फ यह देखकर निष्कर्ष नहीं निकालते कि “El Niño है या नहीं।” वे समुद्र के तापमान, उसके भौगोलिक फैलाव, वायुमंडलीय दबाव, हवाओं और दूसरे महासागरीय संकेतों को भी देखते हैं।

El Niño सिर्फ बारिश की कहानी नहीं है

El Niño का प्रभाव केवल मानसून तक सीमित नहीं है। इसके कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान के पैटर्न बदल सकते हैं। कुछ जगहों पर बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बन सकती है।

वैश्विक तापमान पर भी El Niño का असर पड़ता है। WMO के अनुसार El Niño आम तौर पर वैश्विक औसत तापमान को ऊपर की ओर प्रभावित करता है, हालांकि किसी खास देश या क्षेत्र में उसका स्थानीय असर अलग हो सकता है।

यहां भी सावधानी जरूरी है। किसी एक गर्म दिन, बारिश की कमी या बाढ़ को अकेले El Niño के खाते में डालना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। मौसम किसी एक कारण से नहीं चलता।

El Niño को मापते कैसे हैं?

वैज्ञानिक El Niño की पहचान के लिए प्रशांत महासागर के विशेष क्षेत्रों में समुद्र की सतह के तापमान (Sea Surface Temperature) को मापते हैं। NOAA के अनुसार Niño 3.4 क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान का विचलन El Niño की निगरानी का एक प्रमुख संकेतक है।

NOAA के परिचालन मानदंड में Niño 3.4 क्षेत्र के तीन महीने के औसत समुद्री सतह तापमान का सामान्य से कम-से-कम 0.5°C अधिक होना, निर्धारित वायुमंडलीय परिस्थितियों के साथ, El Niño की पहचान में इस्तेमाल किया जाता है।

आज वैज्ञानिक समुद्र के तापमान के साथ-साथ समुद्र की गहराई, हवाओं, वायुमंडलीय दबाव, बादलों और बारिश के आंकड़ों को भी लगातार देखते हैं। उपग्रहों और समुद्र में लगे उपकरणों से मिलने वाला डेटा इस निगरानी को संभव बनाता है।

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नाम El Niño क्यों पड़ा?

El Niño स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ लगभग “छोटा लड़का” या “बालक” होता है। इसका नाम दक्षिण अमेरिका के प्रशांत तट के मछुआरों और स्थानीय समुदायों से जुड़ा है, जिन्होंने समुद्र के असामान्य गर्म होने की घटना को लंबे समय से देखा था। यह घटना अक्सर क्रिसमस के आसपास दिखाई देती थी, इसलिए इसे ईसा मसीह के बालक से जोड़कर “El Niño” कहा गया।

समय के साथ वैज्ञानिकों ने समझा कि यह सिर्फ स्थानीय समुद्री गर्मी नहीं, बल्कि पूरे उष्णकटिबंधीय प्रशांत के समुद्र-वायुमंडल तंत्र में होने वाला बड़ा बदलाव है।

एक लाइन में समझें El Niño

अगर पूरी प्रक्रिया को बहुत आसान भाषा में समझें तो इसे इस तरह देख सकते हैं:

प्रशांत महासागर की ट्रेड विंड्स कमजोर → गर्म समुद्री पानी पूर्व की ओर खिसका → मध्य/पूर्वी प्रशांत गर्म हुआ → बादल और बारिश का क्षेत्र बदला → वायुमंडलीय परिसंचरण बदला → दुनिया के दूर-दराज क्षेत्रों के मौसम पर असर पड़ा → भारत के मानसून पर भी दबाव पड़ सकता है।

लेकिन अंतिम कड़ी में “पड़ सकता है” बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि भारत का मौसम केवल प्रशांत महासागर से तय नहीं होता। दूसरे महासागरीय और वायुमंडलीय कारक भी इस संबंध को मजबूत या कमजोर कर सकते हैं। इसलिए El Niño को भारत में सूखे की गारंटी नहीं, बल्कि मानसून के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम संकेतक समझना ज्यादा सही है।

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