झांसी के एक अधिवक्ता और उनके परिवार को अलग-अलग मामलों में ₹23.36 लाख मिलने का मामला सामने आया; हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में राहत वितरण की व्यवस्था की जांच के निर्देश दिए

लखनऊ/फतेहपुर: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली राहत और आर्थिक सहायता की व्यवस्था अब उत्तर प्रदेश में जांच के दायरे में आएगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पूरे प्रदेश में यह जांच कराने के निर्देश दिए हैं कि SC/ST अधिनियम और 1995 के नियमों के तहत राहत राशि के दावों और भुगतान की प्रक्रिया में पर्याप्त सत्यापन और निगरानी हो रही है या नहीं। खास तौर पर उन मामलों की जांच पर जोर दिया गया है, जिनमें एक ही व्यक्ति या परिवार की ओर से बार-बार राहत का दावा किया गया हो।
हाईकोर्ट का यह आदेश झांसी के अधिवक्ता संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के बाद आया। राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में बताया गया कि दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को अलग-अलग आपराधिक मामलों में 1995 के नियमों और संबंधित योजनाओं के तहत कुल ₹23,36,250 की राहत/आर्थिक सहायता मिल चुकी है। इसके अलावा करीब 10 से 12 मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष राहत राशि के दावों के साथ लंबित बताए गए।
Also Read: CM योगी का युवाओं को संदेश, सोशल मीडिया से थोड़ा दूर होकर किताबों से जुड़ें
हाईकोर्ट ने दुरुपयोग साबित नहीं माना
अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है। केवल किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा कई मामलों में राहत प्राप्त करने से अपने आप योजना के दुरुपयोग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि बार-बार आपराधिक मामले दर्ज होने और उनके बाद राहत के दावे किए जाने मात्र से दुरुपयोग साबित नहीं होता। हालांकि, दावों की संख्या और प्राप्त राशि का पैटर्न ऐसा था कि इसकी स्वतंत्र और तथ्य आधारित जांच जरूरी है।
इसी आधार पर अदालत ने झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को संबंधित मामलों, उनमें दर्ज आपराधिक घटनाओं तथा प्राप्त या मांगी गई राहत राशि की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने का निर्देश दिया है। यह जांच तीन महीने में पूरी करने को कहा गया है।
पूरे यूपी में बनेगा निगरानी तंत्र
हाईकोर्ट ने केवल झांसी के मामले तक जांच को सीमित नहीं रखा। राज्य सरकार को पूरे उत्तर प्रदेश में SC/ST अधिनियम, 1995 के नियमों और संबंधित सरकारी योजनाओं के तहत राहत राशि के दावों और भुगतान की प्रक्रिया की व्यापक जांच करने तथा प्रभावी नियामक और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया गया है।
जांच में यह भी देखा जाएगा कि राहत राशि जारी करने से पहले दावों का पर्याप्त सत्यापन और जांच की जा रही है या नहीं। यदि किसी स्तर पर योजना के दुरुपयोग या अनियमितता की पुष्टि होती है तो नियमानुसार सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
राहत व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ितों को समय पर सहायता देना
SC/ST अत्याचार निवारण कानून के तहत आर्थिक राहत का उद्देश्य गंभीर अत्याचार के पीड़ितों और उनके आश्रितों को कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार किए बिना निर्धारित सहायता उपलब्ध कराना है। राहत राशि अपराध की प्रकृति और नियमों में निर्धारित चरणों के अनुसार अलग-अलग समय पर जारी की जा सकती है।
इसी व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि विशेष अदालतें केवल प्रशासन की ओर से भेजी गई रिपोर्ट स्वीकार करने वाली संस्था नहीं हैं। नियम 12(7) के तहत अदालत राहत की पर्याप्तता और समय पर भुगतान की स्थिति की न्यायिक समीक्षा कर सकती है और कमी पाए जाने पर संबंधित राहत दिलाने का निर्देश भी दे सकती है।
फतेहपुर में साढ़े चार साल में 11.82 करोड़ से ज्यादा का भुगतान
फतेहपुर जिले से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच SC/ST अत्याचार निवारण योजना के तहत हत्या, दुष्कर्म और अन्य अत्याचार से जुड़े 1,333 मामलों में करीब ₹11 करोड़ 82 लाख 63 हजार की सहायता राशि वितरित की गई। जिले में यह भुगतान शासन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत अलग-अलग चरणों में किए जाने की जानकारी है।
गंभीर मामलों में सहायता राशि का भुगतान FIR, चिकित्सीय परीक्षण, विवेचना, आरोप पत्र और न्यायिक प्रक्रिया जैसे निर्धारित चरणों से जुड़ा होता है। ऐसे में हाईकोर्ट के प्रदेशव्यापी निर्देश के बाद जिलों में पहले से किए गए भुगतान और लंबित दावों की जांच का महत्व बढ़ गया है।
विभाग ने कहा- शासन के निर्देशों का होगा पालन
फतेहपुर की समाज कल्याण अधिकारी सृष्टि अवस्थी के अनुसार, विभाग को प्रथम दृष्टया ऐसा कोई मामला सामने नहीं मिला है जिसमें किसी एक परिवार ने नियमों के विपरीत बार-बार राहत राशि हासिल की हो। उन्होंने कहा कि शासन से जो भी दिशा-निर्देश प्राप्त होंगे, उनका पूरी तरह पालन किया जाएगा।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब मुख्य सवाल यह है कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों में राहत राशि के दावों का सत्यापन किस स्तर तक हुआ है और क्या बार-बार भुगतान वाले मामलों की पर्याप्त निगरानी की गई। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं वास्तविक अनियमितता हुई है या भुगतान निर्धारित नियमों के अनुरूप किया गया था।
इस मामले में ₹23.36 लाख की राशि प्राप्त होना अभी किसी व्यक्ति या परिवार के खिलाफ गड़बड़ी का अंतिम निष्कर्ष नहीं है। अदालत ने भी जांच के जरिए तथ्य सामने लाने पर जोर दिया है। इसलिए अंतिम स्थिति जांच रिपोर्ट और संबंधित सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
Also Read: अब्बास अंसारी ने जताया जान का खतरा, कोर्ट से मांगी सुरक्षा















