देवीपाटन-तुलसीपुर मार्ग मामले में लखनऊ पीठ ने कहा- सहमति न बनने पर 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ही होगी कार्रवाई

विधिक संवाददाता, शुभंकर भानु
लखनऊ। देवीपाटन-तुलसीपुर सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए निजी जमीन लेने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भू-स्वामियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने साफ किया कि किसी जमीन मालिक की इच्छा के खिलाफ उससे जमीन का बैनामा नहीं कराया जा सकता।
मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि भू-स्वामी अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार है और जमीन की कीमत को लेकर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है, तभी स्वैच्छिक बिक्री के जरिए जमीन ली जा सकती है। सहमति नहीं बनने पर सरकार को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत भूमि अधिग्रहण करना होगा।
अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता भू-स्वामियों पर जमीन बेचने का दबाव न बनाया जाए और उनकी सहमति जबरन हासिल करने की कोशिश न हो। कोर्ट ने स्वैच्छिक बिक्री और अनिवार्य भूमि अधिग्रहण को दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं माना है।
करीब 80 फीसदी जमीन पहले ही खरीदी जा चुकी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि सड़क चौड़ीकरण के लिए अब तक करीब 80 प्रतिशत भूमि खरीदी जा चुकी है और लगभग 104 रजिस्ट्रियां भी हो चुकी हैं। हालांकि, कुछ भू-स्वामियों ने अपनी जमीन बेचने पर सहमति नहीं जताई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वे अपनी जमीन बेचने के इच्छुक नहीं हैं और उन पर जमीन बेचने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। कोर्ट ने इसी संदर्भ में स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए जमीन की जरूरत होने के बावजूद प्रशासन भू-स्वामी की स्वैच्छिक सहमति को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
असहमति पर अपनानी होगी अधिग्रहण की प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सरकार और जमीन मालिक के बीच स्वैच्छिक बिक्री को लेकर सहमति नहीं बनती है तो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होगी। यानी केवल दबाव बनाकर या बैनामा कराने के जरिए जमीन नहीं ली जा सकती।
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