30 जून की छापेमारी में 92 पुरुष और 27 महिलाएं पकड़ी गई थीं; गिरफ्तारी प्रक्रिया में खामियों को कोर्ट ने माना प्रक्रियात्मक कमी

लखनऊ: विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग के कथित साइबर ठगी कॉल सेंटर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 119 आरोपितों की गिरफ्तारी और न्यायिक रिमांड को बरकरार रखा है। अदालत ने 14 आरोपितों की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में सामने आई कमियां ऐसी नहीं थीं, जिनके आधार पर पूरी गिरफ्तारी को अवैध माना जाए।
न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बाबिता रानी की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल गिरफ्तार किए गए लोगों की हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया की वैधता से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से गिरफ्तारी के कारण बताए जाने और परिजनों को सूचना देने समेत कई प्रक्रियात्मक पहलुओं पर आपत्ति जताई गई थी।
30 जून की रात 11वीं मंजिल पर छापा
मामला 30 जून 2026 की रात का है। पुलिस ने सूचना के आधार पर समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर छापेमारी की थी। पुलिस के अनुसार मौके पर 119 लोग मिले, जिनमें 92 पुरुष और 27 महिलाएं शामिल थीं। पुलिस ने सभी को गिरफ्तार किया था।
पुलिस का आरोप है कि वहां कथित तौर पर ऐसा कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था, जिसके जरिए अमेरिकी नागरिकों को फोन कॉल और पॉप-अप संदेशों के माध्यम से निशाना बनाया जाता था। पुलिस के मुताबिक, लोगों को कथित रूप से अमेरिकी सरकारी एजेंसियों या अन्य संस्थाओं के अधिकारी बनकर संपर्क किया जाता था।
गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठाए गए थे सवाल
हाईकोर्ट में दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि कुछ लोगों को 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखा गया और उन्हें गिरफ्तारी के आधार तथा कारणों की जानकारी नहीं दी गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि गिरफ्तार लोगों के परिवारों को समय पर सूचना नहीं दी गई।
अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद इन दलीलों के आधार पर गिरफ्तारी को अवैध नहीं माना। पीठ के अनुसार, गिरफ्तारी के आधार और परिस्थितियों की जानकारी बरामदगी मेमो के माध्यम से दी गई थी और उसकी प्रति उपलब्ध कराई गई थी।
परिजनों को सूचना में रिकॉर्ड की कमी
अदालत ने यह भी माना कि गिरफ्तार लोगों के परिजनों को फोन के जरिए सूचना दी गई थी, हालांकि इसकी प्रविष्टि संबंधित रिकॉर्ड में नहीं की गई थी। पीठ ने इसे प्रक्रियात्मक कमी माना, लेकिन कहा कि ऐसी कमी अपने आप में गिरफ्तारी और न्यायिक रिमांड को अवैध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पुलिस के अनुसार, 1 जुलाई को प्राथमिकी दर्ज की गई और अगले दिन गिरफ्तार लोगों को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया था। इसी घटनाक्रम को देखते हुए अदालत ने हिरासत की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं में हस्तक्षेप नहीं किया।
119 लोगों की गिरफ्तारी पर कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से जुड़ी हर प्रक्रियात्मक कमी का प्रभाव समान नहीं होता। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कमियों को ऐसी अनियमितता नहीं माना, जिससे गिरफ्तारियों और उसके बाद की न्यायिक रिमांड को निरस्त किया जा सके। इसके साथ ही 14 आरोपितों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
मामले में साइबर ठगी के आरोपों की जांच और उससे जुड़ी अन्य कानूनी कार्यवाही अपनी अलग प्रक्रिया के तहत जारी रहेगी। हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश मुख्य रूप से गिरफ्तारियों और न्यायिक हिरासत की वैधता से संबंधित है।
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