इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के विवाह पंजीकरण अधिकारियों को दिए निर्देश, संदिग्ध मामलों के लिए ऑनलाइन सिस्टम में फ्लैगिंग व्यवस्था बनाने को कहा

उत्तर प्रदेश में विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ किया है कि विवाह पंजीकरण अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि विवाह के समय वर और वधू में से कोई भी कानून के अनुसार नाबालिग न हो। उम्र से संबंधित दस्तावेजों की विश्वसनीय जांच किए बिना विवाह का प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने यह निर्देश एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान दिए। मामला ऐसे विवाह से जुड़ा था, जिसके पंजीकरण का प्रमाणपत्र अदालत के सामने पेश किया गया, जबकि निचली अदालत के रिकॉर्ड में संबंधित युवती को घटना के समय नाबालिग माना गया था।
अदालत में सामने आया पंजीकरण का गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने विवाह का सरकारी प्रमाणपत्र पेश करते हुए दावा किया कि दोनों पक्षों की सहमति से विवाह हुआ था और युवती बालिग थी। इसके विपरीत अभियोजन की ओर से कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर युवती की उम्र नाबालिग थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने विवाह पंजीकरण से जुड़े अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा कि नाबालिग के विवाह का पंजीकरण आखिर किस प्रक्रिया के तहत हुआ। अदालत के सामने अधिकारियों की ओर से ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड नहीं रखा जा सका, जिससे यह साबित हो कि पंजीकरण से पहले उम्र का समुचित सत्यापन किया गया था।
‘सिर्फ दफ्तर की गलती’ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता मामला
हाईकोर्ट ने उम्र सत्यापन में हुई कथित चूक को सामान्य प्रशासनिक गलती मानने से इनकार किया। अदालत ने संकेत दिया कि विवाह पंजीकरण अधिकारी की जिम्मेदारी केवल दस्तावेज लेकर प्रमाणपत्र जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच भी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पर्यवेक्षण और जवाबदेही तय होना जरूरी है। अदालत के मुताबिक, यदि पंजीकरण व्यवस्था ही बाल विवाह की पहचान करने में विफल रहती है तो बाल विवाह रोकने के लिए बनाए गए कानूनी और प्रशासनिक तंत्र का उद्देश्य प्रभावित होता है।
ऑनलाइन सिस्टम में भी बनेगा निगरानी का तंत्र
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को विवाह पंजीकरण की ऑनलाइन व्यवस्था में ऐसा तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया है, जिससे उम्र सत्यापन की आवश्यकता वाले आवेदन स्वतः चिन्हित किए जा सकें। अदालत ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के अनुरूप पंजीकरण प्रक्रिया को सख्ती से लागू करने पर जोर दिया है।
इससे पंजीकरण अधिकारियों के स्तर पर दस्तावेजों की जांच के साथ-साथ तकनीकी स्तर पर भी एक अतिरिक्त निगरानी व्यवस्था तैयार करने का रास्ता खुलता है।
30 सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट
अदालत ने प्रमुख सचिव, स्टाम्प एवं निबंधन विभाग को जरूरी निर्देश जारी करने और उनकी अनुपालन रिपोर्ट निर्धारित समयसीमा में पेश करने को कहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार विभाग को 30 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी है और मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को निर्धारित है।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी विवाह का पंजीकरण न होने या बाल विवाह के रूप में सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि हर ऐसा विवाह स्वतः शून्य हो जाएगा। विवाह की वैधानिक स्थिति और उससे जुड़े परिणाम बाल विवाह निषेध अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के अनुसार तय होंगे।
पहले भी विवाह पंजीकरण व्यवस्था पर उठ चुके हैं सवाल
उत्तर प्रदेश में विवाह पंजीकरण व्यवस्था की निगरानी को लेकर इससे पहले भी न्यायिक हस्तक्षेप सामने आया है। 2025 में गाजियाबाद में करीब 8,400 विवाह पंजीकरण रिकॉर्ड की जांच कराई गई थी। जांच में कुछ मामलों में उम्र संबंधी दस्तावेजों के ऑनलाइन सत्यापन को लेकर खामियां सामने आई थीं। उस समय भी विवाह पंजीकरण से पहले वर-वधू की जन्मतिथि के सत्यापन पर जोर दिया गया था।
हाईकोर्ट के ताजा निर्देश ऐसे मामलों में उम्र की जांच को महज औपचारिकता के बजाय विवाह पंजीकरण प्रक्रिया का अनिवार्य सुरक्षा उपाय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
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