अक्षत त्रिपाठी पर शांति भंग की आशंका में कार्रवाई; पुलिस रिपोर्ट में छात्रों को सरकार के खिलाफ लामबंद करने का आरोप, विवाद बढ़ने के बाद नोटिस वापस

ग्रेटर नोएडा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र-युवा प्रदर्शन से जुड़े मामले में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी 5 लाख रुपये के बंधपत्र वाले नोटिस को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 4 सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत नोटिस जारी कर छात्र से शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए निजी बंधपत्र और जमानत संबंधी राशि जमा करने को कहा था। हालांकि, विवाद सामने आने के बाद पुलिस ने अब नोटिस वापस लिए जाने की बात कही है।
अक्षत त्रिपाठी गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र होने के साथ-साथ स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की उत्तर प्रदेश राज्य समिति से भी जुड़े हैं। रिपोर्टों के मुताबिक वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े प्रदर्शन में शामिल हुए थे। प्रदर्शन में छात्रों और युवाओं की ओर से पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे उठाए गए थे।
पुलिस रिपोर्ट में क्या आरोप लगाए गए?
कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजी गई पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों को प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे और उनके बीच सरकार विरोधी बातें फैला रहे थे। पुलिस ने इससे विश्वविद्यालय परिसर में तनाव पैदा होने और भविष्य में शांति भंग होने की आशंका जताई। रिपोर्ट के आधार पर मजिस्ट्रेट ने शांति भंग की आशंका को लेकर कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
हालांकि, ये पुलिस रिपोर्ट में लगाए गए आरोप हैं, किसी अदालत द्वारा सिद्ध किए गए तथ्य नहीं हैं।
5 लाख रुपये का नोटिस क्या था?
4 सितंबर को जारी नोटिस में छात्र को यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया था कि क्यों न उसे छह महीने तक शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पाबंद किया जाए। इसके लिए 5 लाख रुपये का निजी बंधपत्र और समान राशि की दो प्रतिभूतियां जमा करने का प्रस्ताव था। यह राशि सामान्य अर्थ में लगाया गया जुर्माना नहीं थी, बल्कि शांति भंग की आशंका से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया में मांगा गया बॉन्ड/सिक्योरिटी था।
मामले की सुनवाई के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी।
छात्र ने आरोपों पर उठाए सवाल
अक्षत त्रिपाठी ने पुलिस की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों से असहमति जताई है। उनका कहना है कि वह लंबे समय से विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद नहीं थे और विश्वविद्यालय में गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि वह विश्वविद्यालय के छात्रों को किसी प्रदर्शन के लिए कैसे लामबंद कर सकते हैं। उन्होंने पुलिस की ओर से इस्तेमाल किए गए ‘सरकार विरोधी प्रचार’ जैसे शब्दों के आधार पर भी सवाल उठाए।
SFI ने भी कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे छात्र गतिविधियों और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जोड़कर सवाल उठाए हैं। संगठन ने दावा किया कि छात्र ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
विवाद के बाद वापस लिया गया नोटिस
इस मामले में सबसे अहम ताजा घटनाक्रम यह है कि पुलिस के अनुसार नोटिस की जानकारी सामने आने और विवाद बढ़ने के बाद उसे वापस ले लिया गया। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने कहा कि छात्र को भी नोटिस वापस लिए जाने की जानकारी दे दी गई थी।
इससे पहले नोटिस को लेकर छात्र संगठनों और अन्य पक्षों ने सवाल उठाए थे। मामले ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने वाले छात्रों पर शांति भंग से जुड़ी कानूनी धाराओं के इस्तेमाल को लेकर बहस को भी तेज किया है।
फिलहाल, नोटिस वापस लिए जाने के बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई क्या होगी, यह स्पष्ट होना बाकी है। वहीं पुलिस के आरोपों और छात्र के पक्ष के बीच तथ्यात्मक अंतर को देखते हुए मामले से जुड़े किसी भी आरोप को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
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