• Home
  • लीगल
  • सरकारी विभागों को समय सीमा का करना होगा पालन: लखनऊ हाईकोर्ट

सरकारी विभागों को समय सीमा का करना होगा पालन: लखनऊ हाईकोर्ट

हाईकोर्ट की दो टूक, लालफीताशाही या धीमी सरकारी प्रक्रिया कानून से ऊपर नहीं, समय सीमा का पालन सभी के लिए जरूरी

लखनऊ हाईकोर्ट

लखनऊ | विधिक संवाददाता, शुभांकर भानू

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी विभाग केवल फाइलों के लंबित रहने, लालफीताशाही या धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर अदालत से देरी माफ कराने की उम्मीद नहीं कर सकते। न्यायालय ने कहा कि कानून के सामने सरकार और आम नागरिक दोनों बराबर हैं और समय सीमा का पालन सभी के लिए अनिवार्य है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने रेल मंत्रालय की विशेष अपील खारिज करते हुए की।

28 दिन की देरी पड़ी भारी

मामला रेलवे की लीज पर दी गई जमीन के किराये को लेकर गैलेंट इस्पात लिमिटेड और रेल मंत्रालय के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है।

दिसंबर 2023 में मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) ने गैलेंट इस्पात लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रेलवे को लगभग 1.79 करोड़ रुपये, उस पर आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने और लीज किराये में संशोधन करने का निर्देश दिया था।

रेल मंत्रालय ने इस फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया, लेकिन निर्धारित कानूनी समय सीमा समाप्त होने के 28 दिन बाद अदालत पहुंचा।

पहले वाणिज्यिक न्यायालय, फिर हाईकोर्ट से भी राहत नहीं

समय सीमा बीत जाने के बाद रेल मंत्रालय ने देरी माफ करने की अर्जी दाखिल की थी। हालांकि, वाणिज्यिक न्यायालय ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि देरी के लिए पर्याप्त कारण नहीं बताए गए हैं।

इसके बाद मंत्रालय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए विशेष अपील खारिज कर दी।

सरकारी प्रक्रिया देरी का आधार नहीं

सुनवाई के दौरान गैलेंट इस्पात लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने दलील दी कि रेल मंत्रालय देरी के पीछे कोई ठोस और उचित कारण अदालत के सामने नहीं रख सका।

इन दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि देरी माफ करना अदालत का सामान्य नियम नहीं, बल्कि एक अपवाद है। यदि कोई सरकारी विभाग समय सीमा के बाद अदालत पहुंचता है, तो उसे स्पष्ट और विश्वसनीय कारण बताने होंगे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फाइलों का एक विभाग से दूसरे विभाग में जाना, प्रशासनिक प्रक्रिया में समय लगना या लालफीताशाही जैसे कारण अपने आप में देरी माफ करने का आधार नहीं बन सकते।

फैसले का क्या है महत्व?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य के मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी विभागों को भी वही कानूनी समय सीमा माननी होगी, जो आम नागरिकों और निजी संस्थाओं पर लागू होती है।

Also Read: सभी जिला जज 20 अगस्त तक दें लंबित मामलों की जानकारी: लखनऊ हाईकोर्ट

Related Posts

गैंगस्टर एक्ट पर हाईकोर्ट सख्त, बहराइच का पूरा केस किया निरस्त

बब्बू शाह की याचिका पर लखनऊ बेंच की टिप्पणी; कोर्ट ने कहा- गैंग चार्ट महज औपचारिकता नहीं, आपराधिक…

समिट बिल्डिंग साइबर ठगी केस में 119 गिरफ्तारियां वैध, हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज कीं

30 जून की छापेमारी में 92 पुरुष और 27 महिलाएं पकड़ी गई थीं; गिरफ्तारी प्रक्रिया में खामियों को…

बाल विवाह के रजिस्ट्रेशन पर हाईकोर्ट सख्त, उम्र जांच के बिना प्रमाणपत्र नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के विवाह पंजीकरण अधिकारियों को दिए निर्देश, संदिग्ध मामलों के लिए ऑनलाइन सिस्टम में…

SC-ST राहत राशि की होगी जांच, हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूपी में बढ़ी निगरानी

झांसी के एक अधिवक्ता और उनके परिवार को अलग-अलग मामलों में ₹23.36 लाख मिलने का मामला सामने आया;…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top